
अमेरिकी टैरिफ से बने असमंजस के माहौल में हो रही एससीओ की बैठक पर दुनिया भर की निगाहें हैं। इसमें मध्य, दक्षिण, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया के 20 से अधिक देशों के शासनाध्यक्ष हिस्सा ले रहे हैं। इसके जरिये भारत की कोशिश खुद को बदले वैश्विक परिदृश्य में संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करने की है।
अमेरिकी टैरिफ के मामले में भारत लगातार दबाव में नहीं आने का संदेश दे रहा है। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा कि भारत दबाव में आने के बदले संकट का सामना करने के लिए तैयार है। भारत ने अब तक रूस से तेल के आयात में कटौती नहीं की है। इसके इतर टैरिफ के संकेत के बाद से भारत नए बाजार की तलाश में कई देशों के साथ अहम समझौते कर चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि एससीओ की बैठक के जरिये भारत, चीन और रूस समेत 20 से अधिक देश अमेरिका को बड़ा संदेश दे सकते हैं।
समझौता अब भी संभव : इस बीच, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) में भारत एवं उभरते एशिया अर्थशास्त्र के वरिष्ठ सलाहकार रिचर्ड रोसो ने कहा कि अमेरिका-भारत के बीच समझौता अब भी संभव है क्योंकि दक्षिण एशियाई देश पर्याप्त रियायतें दे रह दे रहे हैं। विश्लेषक अर्नब मित्रा ने कहा, ग्रामीण मांग व जीएसटी सुधारों से भारत में बड़े पैमाने पर उपभोग में सुधार हो सकता है। अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने कहा, घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण भारत कृषि क्षेत्र को पूरी तरह नहीं खोल पाएगा।
विश्लेषकों का कहना है, मोदी का चीन दौरा संकेत है कि भारत वाशिंगटन के साथ रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ करते हुए और मास्को से सस्ता तेल खरीदते हुए भी संवाद के रास्ते खुले रखने को तैयार है। एक कदम पीछे चले तो भारत की स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा ग्राहक तो है पर कठोर आलोचक भी। रूस रोशनी जलाए रखता है पर राजनीतिक कीमत पर। भारत अपने दृष्टिकोण को रणनीतिक स्वायत्तता कहता है। यह दशकों से कारगर रहा है, लेकिन आज संतुलन बनाने की यह प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा दबाव में है।